आधात्मिक ऊर्जा क्या है ? कैसे बनती है ? कैसे काम करती है ?

आधात्मिक ऊर्जा क्या है गुरूवर ने खोले राज !!आधात्मिक ऊर्जा एक प्रकार की शक्ति है जो सकारात्मक व नकारात्मक कार्य करने में सक्षम है । ऊर्जा हमारे द्वारा ही बनती है ।

आधात्मिक ऊर्जा क्या है ? कैसे बनती है ? कैसे काम करती है ?

हमारे पुण्य (वो काम जैसे किसी की सेवा या कोई अच्छा काम एक स्मृति बन जाती है )वो एक ऊर्जा ही है जो हमें सकारात्मक प्रभाव देती है ।

जप व तप हवन से इसे अर्जित किया जाता है । वहीं किसी का अहित करके एक नकारात्मक ऊर्जा (स्मृति) हम पैदा कर लेते हैं वो भी कार्य करती है ।

गुरूवर ने उदाहरण दिया कि जब एक पत्थर से हम एकाग्रता बना लेते हैं ।जिसका अपना गुरुत्वाकर्षण होता है एक औरा होता है । वह ऊर्जा हमारे हिसाब से काम करती है जिस भाव से हमने उसे पाला होगा (एकाग्रता बनायी होगी ) वह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकती है ।

अपने माता पिता से एकाग्रता का ही परिणाम है कि उनका आशिर्वाद काम करता है व सकारात्मक ऊर्जा आप में प्रवाहित होती है ।विश्व में इसके कूछ उदाहरण आपको मिलते हैं ।

जैसे वेयर वुल्फ (मानव भेडिया) अपनी ही ऊर्जा से खुद को परिवर्तित कर भेड़िया बन जाना ।भारत के असम में ऐसे उदाहरण मिलते है । जब महिलायें खुद को बाध में परिवर्तित करने में सक्षम थी ।ये अपनी ऊर्जा का प्रयोग कर ऐसा कर पाती होगीं ।

ऊर्जा एक ही होती है उसका प्रयोग सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है । उदाहरण से समझें एक गुरू ने अपने शिष्य को माँ पीताम्बर की विद्या का ज्ञान दिया ।

उसने इससे अपने स्वार्थ के लिए। निर्दोष लोगों को कष्ट देने प्रारंभ कर दिया । कालांतर में गुरू ने उस विधा को निष्क्रिय कर दिया । दरबार भी दिक्षित करने से पहले संकल्प करवाता है कि अगर कोई शिष्य इन ऊर्जाओं का गलत प्रयोग करेगा तो उस से वह शक्ति वापस दरबार में चली जाये । यही वह ऊर्जा है जो सकारात्मक होती थी तो ऋषियों का आशिर्वाद फलित होता था

वही ऊर्जा श्राप में प्रयुक्त होने पर देवी देवताओ को भी संकट में डाल देती थी। वही ऊर्जा कम या अधिक होने पर मानव पर विपरित प्रभाव डालती है । कम होने पर रोग बनते हैं अधिक होने पर रोग बनते हैं ।

दिक्षित शिष्यों में अधिक ऊर्जा होने पर उन की क्षमता को बढाने का आग्रह करना पढता है ।विचित्र है महादेव का ज्ञान या कहें विलुप्त हुआ ज्ञान पुनः हमे मिल रहा है ।सुत्र तो दरबार दे रहा है । अनुसंधान व अन्वेषण हमें करने होगें । दरबार का व पुर्ण गुरूओं का आभार व कोटि कोटि नमन है ।

हरिहर

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